Friday, 9 August 2013

सहरा में खे रहे हो नाव......


सहरा में खे रहे हो नाव बात-बात में।
बीता हुआ समय नहीं आएगा हाथ में।।
मंजिल को अगर छूने की ख्वाहिश बना लिए,
हो जाओगे सफल जो अनवरत चला किए।
परवाज नाप लेता है गगन की ऊँचाई,
क्योंकि वह सदा रखता है मेहनत से मिताई।
मेहनत सदा अपना निशान छोड़ जाती है,
कदम गलत उठे तो मुख मोड़ जाती है।
नयनों में सही गलत क्या है दीख जाता है,
सब जानते हुए भी नहीं सीख पाता है।
चढ़ती हुई जवानी चहकती जरूर है,
बस में न की गई तो बहकती जरूर है।
क्यों प्यार के अमृत की जगह अश्क है पीता,
वैभव के मकड़ जाल में दिन-रात है जीता।
सर मात्रभूमि पे क्यूँ झुकाया नहीं गया,
क्यों धूल के चंदन को लगाया नहीं गया।
सोंधीं महकती मिट्टी का मंजर नहीं देखा,
पावों में घाव हो गई खंजर नहीं देखा|
बहते हुए पसीने से मतलब किसे भला,
जो पूज्यनीय है वही जाता सदा छला।
पल-पल जो बदलता वो चलन देख रहा हूँ,
चौड़ी हुई छाती की गलन देख रहा हूँ।
जिसने किया पैदा उसी को डांटने लगा,
तितली के प्रेम में स्वयं को बाँटने लगा।
मेहनत से पढ़ाया लिखाया व्यर्थ हो गया,
समझा था जिसे सार्थक अनर्थ हो गया।
जिस छाँव में पले वो पेड़ काटने लगे,
अब हो गए सबल तो खूब छाँटने लगे।
शीतल मलय पवन की बात क्यों नहीं करता,
निरीह प्राणियों पे हाथ र्क्यों नहीं धरता।
चिड़ियों की मधुर बोल सुनाई नहीं देती,
कीमत क्यों घोसलों की दिखाई नहीं देती।
सो जाओगे जब ऊँघने लगेगा सवेरा,
नजर नहीं आएगा कहाँ खुद का बसेरा।
सच्चाई ने अब झूठ से है हाथ मिलाया,
जिससे विरोध था उसी को कण्ठ लगाया।
क्यों सब उलझ गए हैं आज अर्थ जाल में,
भटके हुए हैं सभी व्यर्थ के बवाल में।
दिन है मगर जी रहे अँधेरी रात में,
सहरा में खे रहे हो नाव बात-बात में।।
बीता हुआ समय नहीं आएगा हाथ में।।
रचना-राजीव मतवाला, ‘रुठ मत मेरी उम्र सेसंकलित


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