Friday, 9 August 2013

बोलो तुमको गैर लिखूं या……..

जीवन के कोरे कागज पर कैसा गीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या मन का मीत लिखूं
अभी तलक तेरी नज़रों का नाज़ वही अंदाज़ वही
कौन समझ पाया है तेरे ख्वाबों का परवाज़ वही
कितने भगत पुजारी छोडे अपनी कंठी माला को
बहुत खोलना चाहा फिर भी ओठों पर है राज वही
दिल के टूटे हुए तार पर क्या संगीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या……..



अश्कों से जो लिखी गई वह कितनी अजब कहानी है
पीड़ा जलन घुटन से लिपटी तुने दिया निशानी है
खुद को भुला चूका हूँ अब तक तेरी सुधियों के पीछे
जितना तुझे जानना चाहा उतनी ही अनजानी है
होती हो अनरीत उसे मै कैसे रीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या……..

सूने आँगन को कैसे आबाद चमन बत्लायेगे
नश्वर है संसार उसे शाश्वत कैसे लिख पायेगे
जहाँ प्यार मनुहार नहीं है भावों की रसधार नहीं
सूखी हुई नदी में आखिर कैसे नाव चलाएंगे
भला दहकते अंगारों को कैसे शीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या……..

ज़हर भरे प्याले को कैसे आखिर मैं हाला लिख दूं
जीवन में विष घोल रही जो कैसे मधुशाला लिख दूं
सुंदर लेकिन गंध रहित है ये टेसू का फूल
सूखे भावों के तराग को कैसे रस प्याला लिख दूं
हारा जो हर मोड़ पर उसे कैसे जीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या……..

सदा सजग प्रहरी को आखिर क्यों सोने वाला लिख दूं
तुम्ही बताओ राज हंश को क्या कौवा काला लिख दूं
मानसरोअर की तुलना क्या छुद्र नदी कर सकती है
पीठ दिखाने वाले को कैसे हिम्मत वाला लिख दूं
स्वर लय छंद बध रचना किस तरह अगीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या

दंभ द्वेष में बंधे हुऐ को कैसे मतवाला लिख दूँ
भावों से कंजूस हिरदय को कैसे दिलवाला लिख दूँ
तोल तोल कर शब्द बेचते धुधला है समाज का दर्पण
ऐसे निपट स्वार्थी को कैसे यार निराला लिख दूं
पत्थर दिल को मतवाला कैसे नवनीत लिखूं
बोलो तुमको गैर लिखूं या……..

रचना:-राजीव मतवाला
प्रकाशित पुस्तक:-स्वप्न के गाँव से


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