कहानी / लेख

पुरानी दहलीज (लघु उपन्यास का अंश )





                                                            लेखक-राजीव मतवाला     

        सर्द हवा बह रही थी। इक्का-दुक्का लोग सड़को पर दिखाई पड़ रहे थे। ज्यादातर गरीब लोग जो देर रात को काम के बाद अपने घरों को लौट रहे थे। कोहरा अपना असर दिखा चुका था| सभी जल्दी-जल्दी अपने घर पहुँचना चाहते थे|
            कहीं-कहीं पर अलाव जल रहे थे।
            एक बूढ़ा अलाव के पास आकर बैठ जाता है। वहाँ पर कुछ पुलिस वाले गर्मी पाने की चाह में बैठे हुए होते हैं। एक दूसरे को फर्जी कहानी सुनाकर अपने रुतवे को वजन देकर आपस में ठहाके लगा रहे होते हैं।
            बूढ़ा अपने में खोया न जाने क्या सोच रहा था। एकदम बेफिक्र...मानो यह रात नहीं दिन हो। अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था... खुशी का दूर-दूर तक कहीं पता न था| शायद अपने किए पर उसे पछतावा था। घर से दूर उसे अच्छा लग रहा था| कहाँ ये खुशहाल समय और कहाँ वो उबाऊ जिन्दगी...उफ...सोचकर उसकी रुह कांप गई। मानो नरक की जिन्दगी से दूर बहुत दूर निकल आया हो।
            धीरे –धीरे उसका मन लगने लगा था। पुलिस वाले नमक मिर्च लगाकर अपनी-अपनी बहादुरी के कारनामें बता रहे होते हैं। बूढ़े के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर गई। वह अच्छी तरह जानता है कि ये पुलिस वाले क्या हैं... इनकी हैसियत क्या है... इनका प्रभाव क्या है।
            जीवन के इस कटु अनुभव को बड़े नजदीक से देखा था। खुशहाल परिवार को बिखरते देखा था। सच पर झूठ का परदा चढ़ते देखा था। जिन्दगी की सुबह को शाम में ढ़लते देखा था।
            अचानक उसके कानों में एक पुलिस वाले की आवाज पड़ी-सुना है, मिर्जा शेख की बेटी अपने एस00 साहब से इश्क लड़ा रही है।
            क्या...दूसरा पुलिस वाला बोला। मानो कोई अजूबी चीज हो। रहा तू बिलकुल अहमक ! अबे यह शेख लोग क्या हम पुलिस वालों की तरह हैं कि इस कड़ाके की ठंड में यहाँ डियूटी कर रहे हैं और वो......
            रजाई में गर्म गोश्त का आनन्द ले रहे होंगे। तीसरा मसखरे के रुप में बोला था।
            सभी बड़े जोर से हंस पड़े जैसे किसी ने सी-क्लास का जोक सुन लिया हो।
            बूढ़े के चेहरे पर रौनक फिर जाती रही। वह वहाँ से उठना चाहा लेकिन उठ न सका क्योंकि वह जानना चाहता था कि मिर्जा शेख के बारे में इनकी और कौन-कौन सी राय है। वह बैठा रहा और सुनता रहा...एक से एक लतीफे।
            मिर्जा शेख जमीदार न हुए गाजर मूली हो गए। जो जैसा चाहे उसे मोड़ दे। सब काल्पनिक...। फिर भी लोग आनन्द ले रहे थे, क्योंकि स्वभाव से ये हंसोड़िये जो थे। इन्हे क्या चाहिए...किसी की उल्टी-सीद्दी कहानी। लेकिन नहीं...इस उल्टी-सीद्दी में बहुत सी हकीकतें हैं। आँखें नम हो आई थीं। दिल हाहाकार कर उठा था...सब कुछ बदल गया था। नहीं बदला तो सिर्फ मिर्जा शेख, लेकिन नहीं...वह भी बदला था...समय के हांथो बदला था।
            उसका एक इशारा फरमान की तरह होता था। लोग उसकी इज्जत करते थे। मानो कोई मसीहा लोगों को हुकूम दे रहा हो। उफ ! यह क्या हो गया...पल भर में सब ख़ाक हो गया। सारे व्यवसाय, सारी इज्जत, ये आवो-हवा, सब नज़रों से ओझल हो गया।
            मिर्जा शेख अब मसीहा नहीं रहा। वह अब सिर्फ मिर्जा है...कुछ पुराने लोग ही उसे पहचानते हैं।
            रात का दूसरा पहर शुरू हो चुका था। बूढ़ा उठा और घर की ओर चल पड़ा। बहुत सी बातें उसे मालुम हुई थीं, जो इससे पहले नहीं जानता था।
            हिन्दुस्तान की आजादी से लेकर आज तक न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखे। जमीदारी क्या गई- सबके मायने बदल गए। शानो –शौकत  और रुतवा...सब खाक हो चुके थे। वक्त ने ऐसा थप्पड़ मारा कि दिन में चाँद तारे नज़र आने लगे।
            बूढ़ा बढ़ता रहा...अपने ख्याली पुलाव में न जाने क्या-क्या बुनता रहा और फिर सोचता है कि मिर्जा...काश तूने दूसरी निकाह न की होती तो यह दिन तुझे न देखने होते... पर मिर्जा क्या करता। वंश बेल नहीं बढ़ रही थी। काफी दवा दारु किया, फिर भी कोई फायदा न हुआ। आखिर बेगम के कहने पर दूसरी निकाह की... शायद यही मिर्जा की बदकिस्मती है।
            दूसरी बीबी से उसे एक बेटा हुआ। हवेली में रौनकें आ गई। सभी खुश थे, दौलत पानी की तरह लुटाई गई। मिर्जा को बुढ़ापे की आस दिखाई दी लेकिन नहीं...ऐसा कुछ भी नहीं था। वक्त ने अपना रुप दिखाना शुरू किया। सरकार ने जमीदारी छीन ली। दूसरी बीबी एय्यास निकली। उसके भाई, माँ-बाप सब एक नम्बर के बदमा्श...सब मिर्जा के सीने पर लोटने लगे। पैसा न हुआ सरकारी खजाना हो गया। जो जैसा चाहता वो वैसा ही भोगता। मिर्जा चाहकर भी कुछ न कर सका।
            दूसरी बीबी सुल्ताना को चाहने वालों की एक लम्बी लिस्ट थी। मिर्जा का हल्का सा भी विरोद्द उसकी जिन्दगी की आखिरी कहानी लिख  देते। आँखें खुली रहते हुए भी मिर्जा ने मानो अपनी आँखें बन्द कर ली थी। अब तो उसे शक भी होने लगा था कि मेरा बेटा अफजल...पता नहीं मेरा है या किसी और का। उसके हाव-भाव खानदानी नहीं लगते, एकदम अलग...विचार अलग...संस्कार अलग....।
            अफजल ऐसा हुकूम देता कि मिर्जा के तन बदम में आग लग जाती मानो वह बाप नहीं बल्कि उसका नौकर हो। सुल्ताना और उसके भाई ठहाका लगाकर हँसने लगते और मिर्जा ठगा सा सभी को देखता रहता और वहाँ से बाहर चला जाता।
            उस दिन भी ऐसा हुआ था। मिर्जा अपनी पहली बीबी रेश्मा के पास बैठा, कुछ निर्णय लेने की सोच रहा था। कि रेश्मा बोल पड़ी- क्या सोच रहे हो ? यही कि मैंने गलती की है आपकी दूसरी निकाह कराकर।
            मिर्जा कुछ न बोला। उसकी आखों से आँसू छलक पड़े। अपनी किस्मत को कोसने लगा। बहुत कुछ कहना चाहकर भी चुप रहा। रेश्मा समझ चुकी थी। मिर्जा क्या सोच रहे है? शायद कुछ अनर्थ करने को...क्योंकि उनके सब्र का प्याला भर चुका था।
            रेश्मा ने मिर्जा का चेहरा अपनी ओर घुमाया और मुस्कराते हुए कहा-अपनी किस्मत को दोष मत दो। किस्मत किसी का बुरा नहीं चाहती। हमारे अपने ही हमको बुरा बना देते हैं। आज मैं सिर्फ मुस्कराते हुए देखना चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम मुस्कराओगे।
            एक पल मिर्जा को अजीब लगा कि रेश्मा क्या कह रही है। शायद वह बहलाने की कोशिश कर रही है, या वह समझ नहीं रहा है। मिर्जा रेश्मा के एक-एक शब्द को सुनता रहा। उसने महसूस किया कि इतना अच्छा वह कभी नहीं बोली थी। उसके शब्द अमृत वर्षा कर रहे थे। सारा कमरा फूलो सा महक उठा था। मिर्जा तनाव से दूर उसके चेहरे पर उभर रहे अंतरात्मा की प्रसन्नता को देख  रहा था और महसूस कर रहा था कि रेश्मा मुझे कोई अच्छी खबर देने वाली है।
            अचानक मिर्जा खुशी से झूम उठा। उसने उम्मीद नहीं की था। उसके आश्चर्य की सीमा न रही। मिर्जा ने रेश्मा को अपनी अंक में भर लिया। अपने हाथों में उसका चेहरा लेकर पागलों की तरह चूमता रहा और कमरे में हँसी के सिवाय कुछ न था। आँखों में खुशी के आँसू आ गए थे... ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया।
            रे...श्...मा....... मिर्जा के होठ कंपकंपा उठे थे। वे बोल नहीं पा रहे थे। मिर्जा के चेहरे पर उभरे मनोभाव को रेश्मा बहुत अच्छी तरह समझ रही थी। वह जानती थी कि मिर्जा को पता लगते ही कि वह माँ बनने वाली हैसुनकर खुशी से पागल हो जाएगा और ऐसा ही हुआ था।
            मेरा अपना होने वाला.......मिर्जा के होठ फड़फड़ा उठे। मिर्जा के ये शब्द तीर की तरह कहीं और लगे थे क्योंकि वह अपने बेटे अफजल को बेटा नहीं मानते थे। उसे अक्सर रंडी की औलाद कहने से भी नहीं चूकते थे।
            आह....! मिर्जा ने गहरी सांस छोड़ी। मानो कोई बोझ उनके सीने से उतर गया हो। रेश्मा मिर्जा की बाहों में अब भी पड़ी थी... और मिर्जा की गर्मी को बड़ी शिद्दत से महसूस कर रही थी। दोनों एक दूसरे को इस कदर सिमटे थे कि दुनिया की नज़र अब उन्हें न लगे।
            वह दिन भी आया जब रेश्मा ने एक सुन्दर सी बेटी को जन्म दिया। सारी हवेली में रौनकें दिखाई दी... मानो सारे रंजोंगम खत्म हो गए हो और वह लौटकर ही नहीं आयेंगे। मिर्जा रूपयों को गरीबों में... आस-पास के रिश्तेदारों की आवभगत में...इतनी की कि अपनी जमींदारी के इतिहास में भी नहीं की थी। लाखों –लाख  दुआएं उस बच्ची के सर पर थी।
            पूरे एक हफ्ते हो गए थे। मिर्जा को अपनी बच्ची और रेश्मा के पास रहते हुए। मिर्जा को इतना खुश रेश्मा ने कभी नहीं देखा था। वह ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करती रही और दुआ करती रहती कि उसकी खुशियाँ हमेशा आबाद रहे।
            नौकर ने एक गिलास दूध लाकर रख दिया। रेश्मा चाहती था कि आज मिर्जा उसके हाथों से दूध पी ले। काफी दिन हो गए थे उसे मिर्जा को अपने हाथों से दूध पिलाए हुए। प्रायः हर रात दूध पिलाने के बाद ही मिर्जा को सोने देती थी|
            मिर्जा ने आज जिद कर रखी  थी कि यह दूध तुम पिओगी। मैंने तुम्हें कभी नहीं पिलाया। रेश्मा को बच्ची क्या हुई उसकी जिन्दगी में जन्नत आ गई थी। मिर्जा बराबर जोर दे रहा था... फिर तय हुआ कि हम दोनो आधा आधा पियेंगे।
            रेश्मा ने आधा पी लिया और अब मिर्जा की बारी थी कि दरवाजे पर सांकल बज उठी। नौकर ने बताया कि कोई मिलने आया है। मिर्जा अभी आते हैं कहकर चले गए। बाहर कोई उनका पुराना मित्र था। कुछ देर गुफ्तगू हुई और वह चला गया। मिर्जा अपने कमरे में आए तो उनकी आँखें खुली रह गईं। सारे सामान अस्त-व्यस्त थे| दूध फर्श पर गिरा था.... पास ही बिल्ली मरी पड़ी थी। मिर्जा को समझते देर न लगी कि दूध में ज़हर था... रेश्मा का जिस्म नीला पड़ गया था... बच्ची रोए जा रही थी......|
            न....हीं.... मिर्जा की चीख  सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक गूँज उठी थी। गांव के सभी लोग उमड़ पड़े थे| मिर्जा की आँख इस बात की गवाह बन चुकी थी कि इस खेल में सुल्ताना का ही हाथ है। लेकिन मिर्जा मूक दर्शक  की तरह सब कुछ होते हुए देखता रहा क्योंकि उसकी बच्ची अभी जिन्दा थी। उसने चुप रहना ही बेहतर समझा।
            अचानक पैर पर ठोकर लगी और बूढ़ा संभल कर खड़ा हो गया। गिरने से बाल-बाल बचा था। पलट कर देखा कि सड़क पर एक बड़ा सा ईटा पड़ा था। करीब पहुँचकर बूढे ने ईटे को उठाकर सड़क के किनारे कर दिया। शरीर में सनसन्नाहट शुरू हो गयी थी। सड़के बिलकुल सूनसान थी। थोड़ी दूर पर अलाव जलता हुआ दिखाई दिया। बूढ़ा अलाव की ओर बढ़ गया। कुछ रिकशे वाले व कुछ पड़ोस के लोग उस अलाव के पास मौजूद होते हैं।
            बूढ़ा अलाव के पास बैठ जाता है। सभी बूढ़े को देखने लगते हैं। उनमें से एक पहचानने की कोशिश करता है लेकिन उसकी कोशिश बेकार जाती है और वह अपनी निगाह अपने साथियों की ओर कर लेता है। अलाव बराबर जल रही होती है। थोड़ी दूर पर कुछ कुत्ते भी गर्मी पाने के लिए करीब आने की चेष्ठा कर रहे थे। सभी आपस में बातचीत कर रहे होते हैं। बूढ़ा अपने ख्यालों में गुम रहता है। वह चुकता है कि यहाँ पर भी मिर्जा शेख की ही चर्चा हो रही है|
            उनमें से एक कहता है कि तुम क्या जानते हो मिर्जा शेख  के बारे मे...?
            दूसरा प्रत्यूत्तर देता है कि यही कि वह एक दिलदार आदमी है।
            तीसरे ने भी प्रश्न किया-और अब.....?’
            उनमें से एक शराबी  बोला-फटीचर......
            चट...की आवाज के साथ बूढ़े का हृदय चटक गया। पीड़ा असहनीय थी ।
            सभी एक साथ हँस पड़े थे।
            बूढ़ा उन सब को बराबर देख रहा था... फिर कुटिल मुस्कान होठों पर तैर गई। यह सोचते हुए कि यह जीवन चक्र है। सुख दुख  का चक्र। बहस करने से कोई फायदा नहीं।
            बूढ़ा अपने सपनों में मग्न था। एक पल को, शराबी की कही बातो से उसे बुरा अवश्य लगा था किन्तु सत्य था..... भले ही कड़ुवा रहा हो। वह शराबियों को जानता है कि शराबी आदमी बुरा होता है और उनको भी जो शराब नहीं पीते हैं। उसने अनुभवों से पाया कि शराब पीने वालों में जितनी दया और करुणा देखी.... उतना उसने गैर पीने वालों में नहीं देखी थी....। जितनी अकड़ शराब न पीने वालों में होती है, उतनी अकड़ शराब पीने वालों में दिखाई नहीं पड़ती। सीमा में रहकर पीने वालों की सोच की क्षमता ज्यादा होती है और वे तीव्र गति से सोचने की क्षमता भी रखते हैं क्योंकि अनुभव इस बात की गवाह है कि जब अस्तित्व बदलता है,  इन्सान के कृत्य अपने आप बदल जाते हैं। फिर आभास होता है कि मेरे भीतर कौन रह रहा है... ताकि मैं जान सकूँ कि मेरे पास जो मेहमान आया है...उसे देखूं.... हमारी देह तो एक मेहमान है और इसके भीतर कोई अजनवी रह रहा है.... वही अजनवी मैं हूँ।
            बूढ़ा अपने में खोया, विचारों के भंवर में झूल रहा था....। लोग अलाव की गर्मी के साथ हंसी-ठहाकों का दौर चला रहे थे। बूढ़ा उठना चाहता है लेकिन नहीं...वह उठ नहीं पाता। घर ही पहुँच कर क्या करेगा। कौन उसकी खबर लेने वाला है। अकेला...सिर्फ अकेला। उसने चीज बदलनी चाही थी...वह चीज जिसे कहते हैं इन्सान...वह जानता है कि जब तक मनुष्य बदलेगा नही कुछ नहीं बदलेगा। लोग केवल दिखावा करते रहेंगे...लोग विश्वास करते रहेंगे...उम्मीद करते रहेंगे...कल्पनाएं करते रहेंगे और अपनी ही दुख  में जिन्दगी गुजारते रहेंगे। जब तक सांसे चलती रहेंगीं। इन्हीं सोचों के साथ वह विचारों के गर्त में डूबता और उतरता रहा।
            बूढ़े ने उठने की फिर कोशिश की..... वह अपनी सोचों में फिर असफल रहा। पुरानी यादें कभी पीछा नहीं छोड़ती। उसे सुल्ताना के बेटे अफजल की छवि उस अलाव में दिखाई दी। क्रूर...बदमिजाज.... जो अब जवान हो चुका है...अपनी माँ सुल्ताना की तरह ऐय्यास भी और उसकी छैलछबीली बीबी...उफ...सुल्ताना और अफजल से भी दो हाथ आगे है। आए दिन प्रार्टी, शराब और फिर रंगीन रातें....
            मिर्जा अफजल को अपना चिराग नहीं मानता। मिर्जा जल बिन मछली की भाँति तड़पता हुआ विष का प्याला पी रहा होता है। उस रोज, जब उसे पता चला कि उसकी बेटी जुली ...अफजल के इशारे पर नाच रही है तो उसके दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। कैसा भाई है... और वो सुल्ताना...माँ न हुई डायन हो गई। कहीं अपने बच्चों को इस तरह...छि....
            अफजल अपने दो नम्बर के धंधे में जुली को पूरी तरह गिरफ्त में ले चुका था। यह बात भी जुली ने ही बताई... यह भी कि यदि वह न करेगी तो अफजल उसे और मिर्जा को जिंदा नहीं छोड़ेगा।
            जुली की आँखों में आँसू थे। वह मिर्जा को बहुत चाहती थी। उसे अपने अब्बू से बहुत प्यार था। वह जानती थी कि यदि कोई है तो केवल उसका अपना अब्बू। पाक दिल हृदय... न कोई बुराई...न कोई बुरी लत। उसे अपने अब्बू पर नाज था इसलिए सब कुछ सह रही थी।
            सुल्ताना और अफजल उसे एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। उसने बताया कि अफजल की कार को एक पुलिस आफीसर ने पकड़ लिया था। उसकी कार में तस्करी के सामान थे। अफजल भाईजान की ऊँची पहुँच होने के नाते उस आफीसर को कार और माल दोनो छोड़ना पड़ा था।
            मिर्जा एक टक सुनता रहा। जुली की लाचारी ने मिर्जा के कांपते हाथो ने हरकत की...लेकिन नहीं...ताकत जवाब दे गई। जुलाई ने उन्हें आगे बताया कि अफजल भाई के कहने पर वह उस आफीसर को अपने रुपजाल में फँसा चुकी है जिससे उसकी कार दुबारा न पकड़ी जा सके।
            जुली के गालों पर आँसू लुढ़क आए थे। वह मिर्जा को रुलाना नहीं चाहती थी| उसने जल्दी से अपने आँसू पोछ लेना चाहा कि......
            न...बेटी...न.... इन्हें मत पोछ... मिर्जा का गला भर आया था। यह जीवन के साथी हैं। इससे तेरा मन हल्का हो जाएगा। मैं भी तो रो रहा हूँ। यदि तेरा ख्याल न होता तो इस दहलीज को हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर देता। लोग भूल जाते कि मिर्जा शेख की यहाँ हवेली भी थी। मिर्जा का चेहरा तमतमा उठा था।
            दोनों बाप-बेटी काफी देर तक एक-दूसरे से गुफ्तगू करते रहे। जुली मिर्जा के सीने पर अपना सर रखकर बात करती रही। बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। मानो जन्नत यहीं है मिर्जा ने अफसोस जताते हुए कहा- तुम्हारे दुखों के लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है बेटी ! मै स्वयं हूँ, और यह मेरी करनी का फल है जो तुझे भुगतना पड़ रहा है। यदि मैं तेरी अम्मी के मरते ही तुझे कहीं लेकर चला गया होता तो यह दिन न देखने पड़ते। इन कम्बख्तों ने तुझे इस तरह जकड़ लिया है कि मैं तेरे हाथ भी पीले नहीं कर सकता।
            जुली ने अपना सिर उठाया और अपने अब्बू के चेहरे को देखने लगी मानो कुछ पढ़ रही हो।
            मिर्जा को लगा कि वह कुछ कहना चाहती है। उन्होंने पूछना चाहा लेकिन होठ न खोल सका। बस...जुली  को देखता रहा। कायनात के गालों पर आँसू लुढ़क पड़े। हृदय पर पत्थर रखे हुए मिर्जा ने यह भी नहीं पूछा कि वह रो क्यों रही है? सब वक्त के हाथों वह जख्म देता है तो वह भर भी देता है। यह सोचता रहा लेकिन होठ न खोल सका।
            आख़िरकार जुली ने अपने आँसू पोछे और बोल पड़ी...अब्बू....! आप मेरा हाथ पीला करना चाहते हैं?
            मिर्जा के आश्चर्य की सीमा न रही...वह गोते लगाने लगे थे। वह यही तो चाहते थे लेकिन कैसे? यह कैसे सम्भव होगा। सुल्ताना और अफजल के होते हुए....यह कैसे...असम्भव...प्रश्न बराबर मिर्जा से टकराने लगे थे और मिर्जा की आँखे शून्य में कुछ तला्श  रही थी.... अवश्य ही कुछ होने वाला है...नहीं कुछ नहीं.... सुल्ताना और अफजल कामयाब नहीं होने देंगे। दोनों ने कई गन्दे राजनीतिको को पनाह दे रखी है। धन-दौलत और वह सब कुछ जिसे मनुष्य क्षण भर सुख  के लिए अपनी मान-मर्यादा को ताक पर रखकर किसी की अस्मत से भी खेल डालता है, और यहाँ तो पूरी थाली ही परोसी हुई है.... फिर यह कैसे सम्भव होगा.....।
            जुली ने अब्बू की आँखों में झांका- अब्बू...! आपने जवाब नहीं दिया? जुली अपने सवाल के जवाब का बे-सबरी से इन्तजार कर रही थी।
            मिर्जा के चेहरे पर हल्की हंसी आई। हाँ बेटी...! पर... समझ में नही आ रहा है कि...
            मैं भी इसी पर से डरती हूँ लेकिन...फिर सोचती हूँ कि कब तक ऐसा चलता रहेगा। इस आर-पार की लड़ाई में कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा नहीं तो अफजल भाईजान मुझे अपने स्वार्थ की खातिर एक दिन अवश्य कालगर्ल बना देंगे।
            नहीं...नहीं... मिर्जा चीख  उठा.... उसके बदन कांपने लगे थे.... वह ऐसा नहीं कर सकता। आखिरकार ... वह तुम्हारा भाई है।
            जब वह आपका बेटा नहीं बन सका अब्बू! तो मेरा भाई कैसा...? जो उसने मुझसे कराये हैं वो एक भाई करता है?
            मिर्जा सन्नाटे में आ गए थे। अपने होशो-हवाश को संतुलित करते हुए गौर करने लगे थे - क्या मिर्जा इतना कमजोर हो गया है कि अपनी इज्जत नहीं बचा सकता.....? क्या मिर्जा इतना लाचार है कि वह अपना हाथ सीधा नहीं कर सकता....? क्या मिर्जा इतना बुजदिल हो गया है कि वो न्याय करना भूल गया है...?
            मिर्जा चहलकदमी करने लगा था और बराबर अपने मन से युद्ध करने लगा। कुछ करने की चाह बलवती होने लगी थी और जुली... अपनी बात पूरी करने में लगी थी। अब्बू..! शायद आप नहीं जानते...अफजल भाईजान! अब तक दो एस00 को अपने बगीचे में दफ्न कर चुके हैं।
            क्या....? मिर्जा की आँखे आश्चर्य में गोता लगाने लगी थी।
            हाँ अब्बू ....!  हर वो एस00 जो भाईजान के लिए काम करते थे और मेरे हुश्न पर फिदा थे| जब भाईजान को लगता कि वो एस00 मुझसे निकाह रचाना चाहता है तो.... एक दिन पार्टी मुर्करर की जाती है और उसे बुलाया जाता है.... फिर देर रात तक जश्न-ए-दौर चलता है। महफिल जब अपने पूरे शबाब पर होती है उसे किनारे ले जाकर....
            जुली एकदम चुप हो गई। दीवार की ओर देखे जा रही थी, जैसे कोई चीज तलाश रही हो। आँखों में भय... चेहरे पर पसीना...होंठ कांप रहे थे.......|
            फिर क्या बेटी...! मिर्जा ने चुप्पी तोड़ी।
            फिर... जुली ने गहरी सांस ली। उसे हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाता है। पर मैं...
अचानक जुली  अपने अब्बू का बांह पकड़कर चीख  सी पड़ी। उसे नहीं खोना चाहती...वह मुझे बहुत चाहता है ....और मैं भी...। मुझे पाने की खातिर भाईजान के गलत कामों में हाथ बंटा रहा है। वह बहुत ही ईमानदार आफीसर है, बिलकुल आप की तरह... मेरी खातिर वह बहक गया है। किसी भी कीमत पर वो मुझे.... कायनात जोर से सिसक उठी...पर भाईजान....।
            मत ले अपनी जुबान से उस कमीने का नाम... वह तेरा भाई नहीं है। जब वो मेरा बेटा नहीं तो कैसा तेरा भाईजान।
            मिर्जा की आवाज सन्नाटे को चीरती हुई सिसकी को दफन कर गई थी। फिर भी सिसकी अपना स्थान था| जुली उसे खोना नहीं चाहती थी। मिर्जा कश्मक्य में फंसे कुछ सोच रहे थे... न कुछ कहते बन रहा था... न कुछ करते.... बस ! एक टक अपनी बेटी जुली को देखे जा रहे था। मिर्जा जुली के करीब आकर अपना हाथ सहानुभूति के साथ उसके सर पर रख  दिया। जुली ने अपना सिर उठाया और मिर्जा के सीने से लगकर रोने लगी।
            जुली ...मेरी बच्ची! वो कौन किस्मत वाला है जो मेरी बच्ची को इतना चाहता है? मैं उसे देखना चाहता हूँ, उसे मिलाओ तो सही। मिर्जा प्यार से सिर पर हाथ फेरते रहे। जुली खुशी से झूम उठी...पर अब्बूकहकर खामोश  हो गई।
            तू डरती क्यों है। मिर्जा ने गहरी सांस ली थी। तूने बाप देखा है, एक जमीदार नहीं। अब तू जमीदार का खौफ देख....। मिर्जा की आँखों में अंगारे उबल रहे थे। तू डरती क्यूँ है...मिर्जा ने गहरी सांस ली थी जैसे कोई अजगर अपने शिकार को लीलने की तैयारी कर रहा हो। मिर्जा को जुली की आँखों में प्रश्न दिखाई दिया। वे हौले से मुस्करा दिए। तू घबरा मत...जा अपने होने वाले दूल्हे को ले आ।
            जुली अपने आँसू पोछते हुए अपने अब्बू को शुक्रिया कहा फिर तेजी से बाहर निकल गई।
            कुत्ते की भौक सन्नाटे को चीर गई थी। किसी ने उसे पत्थर मारा था और वह पो..पो...करते हुए भाग गया था। बूढ़े की विचारश्रंÂला टूट गई थी। अलाव धीमा पड़ चुका था। एक-एक करके लोग उठने लगे थे। रात का दूसरा पहर शुरू हो चुका था। बूढ़ा भी उठने की तैयारी में था। उसके चेहरे पर थोडा सा भय विराजमान था। कोई डर उसके हृदय में था, जिससे वह रह-रहकर अपने अगल-बगल देखने लगता था।
            बूढ़ा उठा और उसके कदम सड़क पर चलने लगे थे। अजनवी राहों में...प्रश्न बार-बार मन में कौंद्दता...न चाहकर भी मिर्जा...उसके मानस पटल पर हावी हो जाते थे। अब भी याद है कि जब जुली अपने होने वाले दूल्हे को लेकर आई थी। मिर्जा बहुत खुश था किन्तु छण भर बाद, वह खुशी महरुम हो गई। जब उसे पता चला कि उसका होने वाला दामाद हिन्दू है और जाति का ठाकुर........।
            बड़े ऊहापोह में मिर्जा पड़ गए थे। सोचने-समझने की शक्ति छीण हो गई थी। मरघट सा सन्नाटा छा गया था। जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। जुली ने उम्मीद छोड़ दी थी। वह नियिचत थी कि वह अपना प्यार नहीं पा सकेगी। आँखें सूज आई थी। लाल-लाल आँखे ..ज्वालामुखी  सी... किन्तु शांत ...यूँ लगता कि बस अभी फट पड़ेगी।
            मिर्जा के जे़हन में बिजली सी कौंध गई थी। कोई और होता तो अब तक म्यान से तलवारें बाहर आ गई होती लेकिन एक बाप मज़बूर था। एक बार दोनों को देखा... फिर सोचा-जाति से क्या होता है आखिर है तो मनुष्य ही... मेरे अपनों ने क्या दिया...? मेरी ही बेटी...मेरे ही अपनों द्वारा उसकी इज्जत....छिः....
            नफरत की एक लकीर माथे पर उभर आई थी।
            और वो गैर...जिसे मेरी जुली जी जान से चाहने लगी है।
            मिर्जा ने एक बार फिर दोनों को देखा और मुस्करा दिया। वहाँ क्यूँ खड़ा है बेटे! आ..मेरे पास आ....। मिर्जा का गला भर आया था।
            जुली को एक बार विश्वास नहीं हुआ कि उसका अब्बू.....उसके होने वाले सौहर को गले लगा लेगें। जुली  की खुशी का ठिकाना न रहा। दोनों काफी देर तक एक दूसरे से बाते करते रहे। इस तरह काफी देर हो चुकी थी। मिर्जा के चेहरे पर अब गम्भीरता ने अपना आवरण चढ़ा लिया था। ऊपर की दीवार की ओर देखते हुए बोले- सुल्ताना और अफजल के होते हुए तुम दोनों एक नहीं हो सकते... और एक होने के लिए तुम दोनों को मेर प्लान को अंजाम देना होगा। उसने और जुली ने एक दूसरे को प्रश्नचिन्ह के दायरे में देखा। मिर्जा ने अपनी सोची-समझी चाल होने वाके सौहार को बता दी कि उसे क्या करना है। वो तैयार हो गया।
            जुली ने सुल्ताना को अफजल की मेरिज एनीवरसरी के लिए तैयार किया। सुल्ताना राजी हो गयी थी ...होना भी था क्योंकि यह उसके बेटे अफजल की मैरिज सालगिरह जो थी। जुली को भी रक्स के लिए तैयार किया गया। सुल्ताना जानती थी कि जुली न कर ही नहीं सकती क्योंकि उसके बाप मिर्जा शेख को यदि जिन्दा रहना है तो........।
            वह दिन आ गया था। हवेली रानी की तरह सजाई गई थी। चारो ओर से भीड़ उमड़ पड़ी थी। बड़े-बड़े लोग इस पार्टी में शिरकत कर रहे थे। जुली अपने खूबसूरत लिबास में गजब ढा रही थी। लिबास उसकी ख़ूबसूरती में चार-चाँद लगा रहे थे। मानो आज उसी की शादी हो। आने-जाने वाले लोग आहें भरकर रह जाते। इक्का-दुक्का लोग टांट भी कस रहे थे किन्तु आड़े-आड़े। क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि ये अफजल की बहन है और अफजल तक यदि ऐसा सुनाई पड़ा तो उनकी खैर नहीं........
            जुली की निगाह बार-बार सामने की ओर जाकर ठहर जाती जिधर से लोग आ जा रहे थे। पार्टी का दौर शुरू हो चुका था| अफजल रक्स के लिए कह चुका था। कायनात इसके लिए तैयार न थी बल्कि मिर्जा के प्लान को अंजाम होते हुए देखना चाहती थी। अफजल इस बीच पुनः रक्स के लिए कह गया।
            सभी नशे में चूर थे। इससे पहले की जुली रक्स के लिए राजी होती कि उसके चेहरे पर चमक आ गई। जिसका वह इन्तजार कर रही थी वह आ चुका था.......।
            उसका होने वाला सौहर अपने लाव-लश्कर के साथ हाल में प्रवेश किया और अपने सिपाहियों से पूरे परिवार को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। इससे पहले अफजल कोई सवाल करता की उसके सौहार ने भरी सभा में एलान किया कि मिर्जा शेख .... जो इस हवेली के मालिक और अफजल के वालिद है,  उन्होंने एफ0 आई0 आर0 दर्ज कराया है कि इस इलाके में तैनाव दो एस00 जो लापता है उनकी अफजल ने हत्या कर अपने बगीचे में उनको दफन कर दिया गया है। उन स्थानों पर, सिपाहियों को हुकूम देता हूँ कि वे बगीचें में खुदाई का कार्य जारी करें।
            दो सिपाही अलग-अलग स्थनों पर खुदाई करने लगे थे। लोग वहाँ पर पहुँचकर उस स्थानों को चारो ओर से घेर कर खड़े हो गए। लोगो में काना-फूसी शुरू हो चुकी थी। पत्रकार और कैमरा मैन भी उपस्थित थे.....।
            अफजल अपने वालिद मिर्जा को खा जाने वाली निगाहों से घूर रहे थे  और मन ही मन बुदबुदा रहे थे  कि तुझे देख लूंगा बुढ़े।
            सुल्ताना सोचने पर मजबूर थी कि मिर्जा को किसने बताया कि लाश यहाँ पर गढ़ी है। जरूर किसी....अचानक सुल्ताना की निगाह जुली पर गई। उसके चेहरे पर प्रसन्नता की लड़ी थी जो इस बात की गवाह थी कि हो न हो, जुली ने ही....वह निश्चित हो गई कि इसमें जुली का हाथ है।
            मिर्जा के चेहरे पर प्रसन्नता देखते बनती थी। मानो वर्षों बाद इन्हें इतनी प्रसन्नता मिली हो। जुली को देखा वह भी खुश थी। कुछ देर बाद दोनों जगहों पर खुदाई में दो लाशें मिली।  लाशे वर्दी सहित दफन थी, जो इस बात की गवाह कि ये दोनों उन्हीं एस00 की लाश है। लाश को कब्जे में कर लिया गया। 
            अफजल ने जुली के सौहर को लम्बी लालच देकर अपनी तरफ मोड़ना चाहा लेकिन दाल गलती नजर नहीं आई। सुल्ताना, अफजल, अफजल की बीबी और सुल्ताना के भाई, बहन और उसके बाप को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
            मिर्जा जुली को लेकर पास ही के मंदिर पर पहुँच गए थे। जुली दुल्हन बनी खड़ी थी। वह होने वाले सौहार  का इन्तजार क्र रही थी। मिर्जा की निगाह रह-रह का बेटी जुली पर जाकर टिक जाती थी। आज उसकी जुली बड़ी सुन्दर लग रही थी। इतनी कि जैसे सारी कहकशा जमी पर उतर आई हो। मिर्जा बहुत खुश था। वो अपनी बेटी का हाथ पीला जो करने जा रहा था।
            अब्बू......! जुली मिर्जा को अपनी ओर बार-बार देखते हुए पाती है तो बरबस ही पुकार उठती है। उसकी आँखें भर आई थीं और बुदबुदा उठी कि अब आप का ख्याल कौन रखेगा.... ?
            वही....ऊपर वाला...जो सबका रखवाला है। मिर्जा जुली को सीने से लगा लेता है । तू घबरा मत...सब ठीक हो जायेगा। आज मेरा सपना पूरा हो रहा है। तू नहीं जानती कि मैं नाउम्मीद हो चुका था।
            मिर्जा की आखों से आँसू छलक पड़े थे। खुशी और गम के बीच के आँसू...असीम आँसू थे। जीवन के इस चक्र में इन्सान कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है। यही सोच मिर्जा अपने होने वाले दामाद का इन्तजार करता है और यह इन्तजार बड़ा सुखमय बदलाव का प्रतीक है कि अब उसके जीवन में खुशियाँ आने वाली है और यह इन्तजार कुछ ही छड में पूरी हो गई। मिर्जा ने मंत्रोचार के साथ अपनी बेटी का विवाह देखा.... जो हर बाप का एक सपना होता है। दोनों को आशीर्वाद दिया फिर सीने से लगा लिया। तत्पश्चात मिर्जा दामाद से बोला कि बेटे ! अपने जीवन की अमूल्य निद्दि तुम्हें सौंप रहा हूँ। मेरी बच्ची को किसी भी तरह का कष्ट मत देना। मेरी बस इतनी विनती है।
            मैं आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगा बाबू जी ! उन्होंने प्रतिउत्तर दिया।
            बाबू जी...मिर्जा बुदबुदाया। एक बार फिर सीने से लगा लिया और सोचने लगा कि उम्र के इतने बसन्त गुजरने के बाद आज तक मेरे अपने ने अपना सा शब्द नहीं बोला। मिर्जा गदगद थे... उन्हें अपनी बेटी की पसन्द पर नाज था कि वह भी किसी का बाबू है... उसे भी कोई अपना पुकारने वाला है। उसने दामाद और बेटी के माथे  को कई बार चूमा था......|
            विदाई का समय...मिर्जा ने दामाद के हाथ में एक ब्रीफकेस थमा दिया और कहा-यह मैं अपनी बेटी के लिए संजोकर रखा था। आज तुम्हें सौंप रहा हूँ। इससे तुम दोनों अपनी जिन्दगी आराम से काट सकते हो।
            जुली ने ब्रीफकेस खोला... दोनों देखकर दंग रह गए। नोटों से भरा ब्रीफकेस... इससे पहले दोनों कुछ बोलते कि मिर्जा ने समझा-बुझाकर राजी कर लिया। न चाहते हुए भी उन्हें स्वीकार करना पड़ा था।
            जुली अपने सौहार के साथ जा चुकी थी। मिर्जा वहीं खड़ा देर तक राहों पर निगाह जमाए रहे कि अभी उनकी जुली लौट आएंगी। आख़िरकार मन को दिलासा देते हुए घर की ओर चल पड़े।
            जुली लोगों की नज़रों से काफी दूर-बहुत दूर निकल गई थी और उसने अपने सौहर की नौकरी भी छुडवा दी थी क्योंकि वह जानती थी कि अफजल की ऊँची पहुँच होने के नाते जल्दी जमानत पा जाएगा और फिर उसे जिन्दा नहीं छोड़ेगा। उसे चिन्ता सता रही थी, अपने वालिद मिर्जा की...लेकिन वह कर ही क्या सकती थी... कितना समझाया था कि साथ चले लेकिन नहीं माने। अपनी जिद के आगे टिके रहे। यही कहते रहे कि मुझे कुछ जरूरी काम है जिन्हें पूरा करके ही आऊँगा।
            समय अपनी गति से चलता रहा और बूढ़ा भी... यूँ लग रहा था कि रात उसके लिए है ही नहीं। बस...चलता रहा...ख्यालों को हमसफर बनाता रहा...कि वृक्ष  उत्सव माते हैं...पंछी गाते हैं। उनके पास तो कुछ नहीं होता। न बैंक बैलेन्स...न कोई प्रतिष्ठा...न सत्ता। न वे राष्ट्रपति होते हैं... न ही प्रधानमंत्री..... लेकिन क्या हमने बक्षों  और पंछियों को उदास...चितिंत और भविष्य के बारे में सोचते हुए देखा है.... नही| वे सहज रुप से जीते हैं फिर मनुष्य को क्या हो गया है। मनुष्य के बुनियादी जीवन दर्शन की तरह मार्ग दर्शक होते हैं कि परेशानी पैदा मत करो। परम्परा पर चलो...परम्परागत रास्ते पर चलो। लीक पीटो...हिंदू बनो...मुसलमान बनो...ईसाई बनों...चर्च जाओ...मस्जिद जाओ...मंदिर जाओ लेकिन परेशानी मत पैदा करो...पानी में खलबली मत मचाओ। बस किसी तरह खुद को बचाये रखो और इस खुद में कौन कितना हलाकान होता है यह उससे कोई लेना देना नहीं। सिर्फ इस विचार में जीवन काट रहा है कि जीवन को कैसे आरामदेह बनाया जाए...न कि सच्चा...सिर्फ आरामदेह...और सुविद्दाजनक। समाज का मूल मंत्र भी यही है जो सुलाने वाली दवा है।
            जबकि वह अपने दुख  को पार नहीं पाता। दुख  से पार पाने के लिए मनुष्य को क्रान्तिकारी होना होगा। दुनिया की सबसे बड़ी क्रान्ति का नाम है जिन्दगी की दुख संरचनाओं से बाहर निकले। जिसमें कई तरह के जोखिम उठाने होंगे। समाज स्वीकार नहीं करेगा...भीड़ हमारा आदर नहीं करेगी। भीड़ तभी आदर करती है, जब हम स्वयं भी भीड़ के अंग होते हैं। अगर हम आदर चाहते हैं तो भीड़ का अंग होना होगा...यानी भेड़ों के झुंड में एक भेड़ होना होगा। 
            लेकिन मैं भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता। मैं एक व्यक्ति बनना चाहता हूँ... भीड़ का हिस्सा मैं काफी दिनों से हूँ। मैं जुझारू हूँ...इस मूल मंत्र को भूल गया था। मुझे संघर्ष से प्यार है। मुझे जुझारू होने पर गर्व भी है इसलिए आज रिलैक्स महसूस कर रहा हूँ क्योंकि मैंने आज जो लड़ाई लड़ी है पूरे संपूणता से लड़ी है... और मैं आज मायावी मोह से मुक्त हो गया हूँ।
            बूढ़े के कानों में दूर से फायर ब्रिगेड के साइरन की आवाज सुनाई पड़ी। आवाज द्दीरे-द्दीरे करीब आती गई। बूढ़ा मुस्करा उठा...वह तेज रफ्तार से दौड़ती हुई गाड़ियों को पास से गुजरते हुए देखता रहा। गाड़ियाँ उसकी नज़रों से ओझल हो गई तो वह फिर अपने रास्ते चल पड़ा। चलता रहा...मन का उद्देड़बुन साथ लिए। उसके चेहरे पर किसी भी तरह का कोई गम नहीं था ...कोई पछतावा नहीं था.... वह आज मुक्त था....मोह माया से दूर ... इस अंद्देरी राहों का हमसफर बन घूम रहा था ........।
            थोड़ी ही दूर पर चौराहे के एक ओर पी0 सी00 की दुकान दिखाई पड़ी। दूर तक कोई दिखाई नहीं पड़ा। बूढ़ा आगे बढ़ता है और गेट खोलकर नम्बर डायल करने लगता है। उद्दर से हलो की आवाज आती है।
            मैं...बूढ़ा कांपते हुए बोला....मैं तेरा अब्बू बेटी....!
            अब्बू.... जुली फोन पर सिसक पड़ी।
            दोनों चुपचाप रोते रहे। कोई प्रतिक्रिया नही...मानो बिना बात के दोनों सब समझ रहे हों।
            अब्बू...जुली काफी देर बात बोली। आप कैसे है...मैं तो समझी थी कि...
            न...बेटी...न... तेरा अब्बू इतना कमजोर नहीं है कि खुद की हिफाजत न कर सके। तू भूल गई न...मैंने तुझसे कहा था... कि तूने बाप देखा है... एक जमीदार नहीं....।
            मैं समझी नहीं अब्बू....? आवाज ठहर कर आई थी।
            आज सुल्ताना...अफजल...सभी जमानत पर रिहा हुए थे। मुझे आभास था कि रिहा होते ही वे बरबादी का मंजर देखेंगे ... पर मैंने पहले ही सब इन्तजाम कर रखा था।
            जुली सांस रोके सुन रही थी।
            उनके हवेली में कदम रखते ही मेरे किराये के आदमियों ने उन्हें बांद्द दिया। मैंने जी भरके बारी-बारी सबको पीटा.... और तब तक सबको पीटता रहा जब तक कि वे सब अद्दमरे नहीं हो गए। दौलत का सारा नशा पल भर में काफूर हो गया था। जिन्दगी की भीख  क्या होती है इस पलभर में जान गए थे। सुल्ताना का बाप और उसकी छोटी बहन भी थी। उसके बाप को मैंने अपना कपड़ा और उसकी छोटी बेटी को तेरा कपड़ा कपड़ा पहनाकर कुसी-मेज आदि पर बाँद्द दिया। फिर .... सारी हवेली को मिट्टी के तेल का छिड़काव किया...उन सब पर भी... मैंने आग लगा दी...सब ख़ाक हो गया.......|
मिर्जा के साथ मिर्जा का वंश खत्म हो गया।
            अब्बू.... जुली की आवाज में घरघराहट थी। वो अपने अब्बू मिर्जा की बातों को सुन रही थी.... रोती जा रही थी और सोच रही थी कि मेरा अब्बू इतना कठोर भी है...बचपन से लेकर आजतक केवल उनकी आँखों में प्रेम के सिवाय कुछ नहीं देखा था.......
            समय पंख  लगाकर उड़ता रहा। अंत में मिर्जा ने इतना कहा कि मिर्जा की दहलीज पर भूल से भी कदम मत रखना। अब वहाँ तेरा कुछ नहीं है सिवाय राख  के।
            और आप अब्बू...जुली  हिचकी लेकर रोने लगी।
            मैं तेरे करीब हूँ...सिर्फ अब्बू...मिर्जा नहीं....| मैं अपनी बेटी से मिलने आऊँगा। मुझे ढूंढ़ना मत... और हाँ...भूल से भी किसी से जिक्र मत करना।
            बूढ़ा किस लेकर रिसीवर रख  देता है। आँखे गीली थी। दरवाजा खोलकर बाहर आया। आकाश की ओर निगाह उठी...एकदम शांत वातावरण...बिलकुल शान्त और इतना शान्त कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। चलने को हुआ तो अपने सामने एक अक्स दिखाई पड़ी। अकस्मात बूढ़े के होठो से शब्द बोल पड़े। रे...श...मा.......
            रेशमा ने बूढ़े मिर्जा का हाथ पकड़ लिया और एक टक देखती रही। चेहरे पर मुस्कान थी। मिर्जा सहज भाव से उसे देखे जा रहे थे कि मानो रेश्मा जिन्दा है।
            रेश्मा... मिर्जा ने पुकारा...मैं आज बहुत खुश हूँ।
            मैं भी... हमारी जुली अब सुरक्छित है। आपने मेरी जुली की हिफाजत की... इससे बढ़कर मेरी कौन सी खुशी हो सकती है।
            रेश्मा एक ओर चलती रही... और मिर्जा खिचे हुए चले गए जैसे उनकी इच्छा हो। सूनसान जगह पर एक झोपड़ी के नीचे दोनों ने शरण ली। मिर्जा को बड़ा शकुन मिल रहा था। रेश्मा से ज्यादा बातें तो नहीं की, जैसे दोनों एक दूसरे की बाते समझ रहे हो।
            रेश्मा...मिर्जा के सीने में अपना सिर रख सोती रही... और मिर्जा दीन-दुनिया से दूर अपनी दुनिया में रेश्मा से अपने जीवन की घड़ियों की बातें करते रहे। कि इन्सान बिना जरूरत समस्याएं पैदा करता है। मिर्जा अपने भीतर कुछ तला्शने की कोशिश करता है और याद आती है सुकरात के कुछ शब्द कि अपने आपको जानो...लेकिन उनकी बात कोई नहीं सुनता क्योंकि हम पहले ही तय कर चुके होते हैं कि हम एक घिनौने व्यक्ति हैं...बीमार हैं...बदसूरत हैं। हर तरह का मवाद हमारे भीतर मौजूद है इसलिए हम अपने भीतर नहीं झांकते। आज हमने वो सारे आवरण फेंक दिए और मैं चिंता मुक्त हूँ। इससे पहले मैंने इतना हल्का कभी नहीं महसूस किया था......।
            मिर्जा बातें करते-करते न जाने कब सो गए। चिड़ेयों की चहचहाट से उनकी आँखें खुली। आकाश साफ था। सर्य की किरणें अपना प्रकाश फैला चुकी थीं। अन्द्दकार दूर था....। मिर्जा ने अपने अगल-बगल देखा... रेश्मा न दिखाई दी। फिर कुछ याद आते ही मुस्करा उठा।
            मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे। मिर्जा के जीवन का अंद्दकार छट गया था। उठे और सड़क पर आ गए। सड़क के किनारे कुछ बच्चे अखबार लेकर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। शेख  मिर्जा की हवेली जलकर ख़ाक.... उनका पूरा परिवार खत्म हो गया। लोगों की भीड़ खबर को पढ़ने के लिए जुटी थी। सबकी अपनी-अपनी राय थी। कोई अच्छा आदमी था... कोई कहता कि एक हस्ती खत्म हो गई।
            सब अलग-अलब नजरिये पेश कर रहे थे। मिर्जा ने भी एक पेपर लिया। चलते-चलते पढ़ने लगे। रह-रह का बीच-बीच में मुस्करा उठते थे। इस तरह अन्जान राहों में देर-बहुत दूर निकल गए उन्हें अब कोई ग्लान न थी क्योंकि उनके जीवन का अंद्देरा हमेशा के लिए छट चुका था..........

                                                            -इति शुभम.....

फूलमतिया (लघु उपन्यास का अंश )

( आस्था और सामाजिक रुढ़ियों के टकराव की कहानी )
लेखक:-राजीव मतवाला


फुलमतिया के माँ बनने की चर्चा पिछले दस दिनों से बच्चे-बच्चे की जुबान पर है|
सामान्य परिस्थितियों में शायद कोई खास महत्व नहीं होता लेकिन फुलमतिया ने तो विशेष परिस्थितियों में बेटा जन्मा है|
किसना कहार की इकलौती बेटी फुलमतिया विधवा है|
सात साल की उम्र में गुड्डे-गिड़ियों की तरह होने वाले अपने विवाह की तो उसे ठीक से याद भी नहीं है|
जवानी की चौखट पर पहला कदम रखते ही सस्ते से लाल जोड़े में लपेटकर उसे एक अनजान युवक के साथ विदा कर दिया गया|
ससुराल आगमन के तीसरे दिन ही उसका पति परलोक सिधार गया. मानो इस दुर्घटना के लिए फुलमतिया सीधी जिम्मेदार थी. सास-ससुर के साथ सारे गाँव ने उसे अशुभ होने का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया|
बेटे के दुःख में विछिप्त से माता-पिता ने कोस-कोस कर परमात्मा का सारा क्रोध उस पर निकालने का प्रयास किया|
जब परिस्थितियाँ असहाय हो गई तो फुलमतिया जैसी गई थी वैसी ही बाप के घर वापस आ गई|
सभी ने उससे सहानभूति जताई लेकिन फुलमतिया को न उस दुःख का पता था, न ही लोगों की हमदर्दी का मतलब वह समझ रही थी|
यह सब इतनी तेजी से घटित हुआ, जैसे सिनेमा हॉल में बैठे दर्शक के सामने से फिल्म गुजरती है|
धीरे-धीरे यह घटना पुरानी पड़ गई|
जीवन अपनी गति से आगे बढ़ गया|
फुलमतिया को जीने का एक नया अंदाज बता दिया गया और उसने हमेशा की तरह इस आज्ञा को भी एक मूक जानवर की तरह मान लिया|
फुलमतिया उम्र के नाजुक मोड़ पर खड़ी थी. बचपन और यौवन की वयं संधि पर खड़ी अभी वह अपने आप को नए परिवेश में ठीक से ढाल भी नहीं पाई थी कि उसके शरीर में परिवर्तन तेजी से होने लगे. उसका मन भी नई-नई भावनाओं को जन्म देने लगा. और दुःखजिसको लड़कपन में वह एक मामूली हादसे की तरह सह गई थी. अब कचोटने लगा. उसे एक रिक्तता का अनुभव होने लगा|
उन दिनों वह अपनी माँ की तरह ठाकुर की हवेली में काम करती थी|
ठाकुर अभय प्रताप सिंह पुराने जमींदार है. वक्त को करवट बदलते अपनी आँखों से देखा है उन्होंने|
एक ज़माने में उनकी यह हवेली दूर-दूर तक अपनी मिसाल रखती थी. इसका अंदाजा आज भी उसके बुलंद दरवाजे को देखकर  लगाया जा सकता है. यह बात दूसरी है कि आज यह अपनी उसी ऊँचाई के बावजूद वह लोगों के मन में वह आदर और भय नहीं उत्त्पन्न कर पाता|
कालचक्र के साथ आज वह जन बनकर रह गए हैं पर  उनके पुरखे कभी इलाके के लोगों के भाग्य का फैसला करते थे|
परिवर्तन तो शाश्वत है. हम चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते, फिर भी प्रयास तो करते ही हैजब तक हार नहीं जाते|
ठाकुर साहब भी अपवाद कैसे होतेवे भी पुरखों की पूँजी को लुटाकर पुराने गौरव को जिन्दा रखने का असफल प्रयास कर रहे हैं. आज उनके पास विरासत के नाम पर एक अदद जर्जर हवेलीथोड़ी जायदाद और पुरखों की गौरवगाथा तथा परिवार के नाम पर एक बेटा….जिसे उनकी स्वर्गीय पत्नी १५ वष पहले उन्हें सौंप कर इस दुनिया से चल बसी थी|
उनका बेटा दिग्विजय बड़ा होनहार है. ठाकुर साहब ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पालकर बड़ा किया है. आजकल शहर में शिक्षा प्राप्त कर रहा है|
अब की बार जब दिग्विजय गर्मियों की छुटियों में गाँव आया तो फुलमतिया दिखाई पड़ती हैदोनों ने एक दूसरे को देखा|
बचपन में वे दोनों साथ खेलते थे. उन दिनों फुलमतिया अपनी माँ के साथ हवेली आया करती थी|
दोनों घर का खेल जोड़ते और घंटों एक दूसरे में खोए रहते. इस दौरान उनकी कई बार लड़ाई भी हो जाती पर एक दूसरे के बिना अधिक देर रह नहीं पाते, फिर मिल जाते|
फुलमतिया को काफी दिनों के बाद देख रहा था दिग्विजय. काफी बदल गई थी. बचपन की चंचल फूल की तरह खिली हुई फुलमतिया भरपूर यौवन में भी उदास और लुटी सी दिख रही थी|
दिग्विजय को जब उसकी कहानी का पता चला तो बचपन की सखी के प्रति उसकी संवेदना पूरी तरह स्वाभाविक थी|
वह फुलमतिया को इधर-उधर काम करते हुए देखता रहता. उससे बात करना चाहता पर साहस नहीं कर पाता|
आज भी फुलमतिया उसे अच्छी लगती है. एक आकषर्ण सा उसके अंदर पनप रहा था.      उसका भोला यौवन दिग्विजय के मन में बसता जा रहा था|
व्यवस्था का निषेध अधिक देर तक हमारी भावनाओं को बांधे नहीं रख पाता|
एकदिन दोपहर के बाद फुलमतिया दिग्विजय के कमरे में नाश्ता लेकर आई, अभी वह ट्रे मेज पर रख ही रही थी कि दिग्विजय ने पीछे से उसके कन्धे पर अपने हाथ रख दिए|
फुलमतिया के पूरे शरीर में जैसे बिजली की धारा दौड़ गई, वह सीधी खड़ी हो गई. दिग्विजय ने उसे हाथों के इशारे से अपनी ओर घुमा लिया|
फुलमतिया ने बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी आँखें उठाकर दिग्विजय की ओर देखा|
दिग्विजय डूब गया उनमें….उसके शब्द मौन हो गएपर आँखें कहने से नही चूँकी…..
मैं तुम्हारी बड़ी-बड़ी गहरी आँखों में डूब जाना चाहता हूँ……
फुलमतिया की आँखों में प्रार्थना थी|
बड़ी मुश्किल से सँभालती हूँ अपने आपकोमुझे कमजोर मत बनाओ, बहक जाऊँगी मैं|
यह स्थिति थोड़ी देर ही रही होगी कि फुलमतिया को अपनी स्थिति का आभास हो गया|
वह तेजी से कमरे के बाहर निकल गई|
उस रात दिग्विजय को नींद नहीं आई| फुलमतिया का चेहरा उसकी आँखों के आगे नाचता रहा. वह सुबह का इन्तजार कर रहा था. आखिर रात बीत ही गई|
सुबह से ही उसकी आँखें फुलमतिया को तलाश करने लगी. परन्तु वह उसके सामने नहीं पड़ी| दो दिन तक यही स्थिति रही|
दिग्विजय बेचैन हो गया|
तीसरे दिन उसने बड़ी नौकरानी से अपना कमरा साफ़ कराने के लिए कहा- उस समय फुलमतिया शाम के भोजन की तैयारी करवा रही थी|
बड़ी ने फुलमतिया को वह काम बंद करके कमरा साफ़ करने के लिए कहा|
फुलमतिया ने नजरें उठाकर दिग्विजय को देखा. वह उसकी बात का अर्थ खूब समझ रही थी| दिग्विजय खड़ा मुस्कुरा रहा था|
फुलमतिया चुप-चाप उठी और कमरे में झाड़ू लेकर पहुँच गई. दिग्विजय अभी तक बाहार ही था|
वह एक-एक चीज को व्यव्स्थित करने लगी. मेज पर दिग्विजय का फोटो रखा था| उसने उसे उठाकर अपने आँचल से साफ़ किया फिर दोनों हाथों से साफ़ किया फिर दोनों हाथों में पकड़ कर अपनी आँखों के सामने ले आई….प्यार भरी नजरों से निहारा और मन ही मन कहा-
तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करतेक्यों मुझे तबाह कर देना चाहते हो…..
अभी वह मंत्र-मुग्ध सी फोटो देख ही रही थी कि दिग्विजय का हाथ पीछे से उसके कँधें पर पड़ा|
जैसे  उसकी चोरी पकड़ी गई. उसने जल्दी से फोटो को यथा स्थान पर रख दिया| वह नजरें जमीन में गड़ा कर चुपचाप खड़ी हुई पैर के अंगूठे से कमरे के पुराने कालीन को कुरेदने लगी|
दिग्विजय उसके सामने आ गया था|
उसने फुलमतिया के चेहरे को ऊपर उठाया|
फुलमतिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया| उसकी आँखें बंद हो गई. मानो वह अपनी कमजोरी छुपाए रखना चाहती थी|
दिग्विजय पता नहीं क्या-क्या कहता रहा पर फुलमतिया के कानों में तो कोई आलौकिक संगीत गूँज रहा था| वह बेसुध सी हुई जा रही थी. दिल जोर-जोर धधक रहा था|
पैर काँप रहे थे| उसे लगा जैसे वह अभी गिर पड़ेगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं| दिग्विजय ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया| उसके काँपते हुए होठों अपने प्रेम की मोहर अंकित कर दी थी|
फुलमतिया उसके शरीर की गर्मी से पिघलने लगी थी| उसने अपने आप को ढीला छोड़ दिया|
दिग्विजय ने जब उसके रक्तिम मुखड़े को उठाया तो उसने फुस्फुसाते हुए प्रार्थना की…..
छोड़ दीजिए कुँवर साहब! किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा|
लेकिन उसकी आँखें जैसे कह रही थीपीस कर रख दीजिए मुझे….|
दिग्विजय भी वक्त नजाकत को जानता था| उसने फिर अपने होठ फुलमतिया के होठों पर रख दिए, जैसे उसका सारा रस चूस लेना चाहता हो|
दिग्विजय के बाहुपास से आजाद होने के बाद फुलमतिया ने जल्दी से अपने आपको संयत किया और बिना सफाई किये ही कमरे से चली गई|
प्रेम की अगर एक हलकी सी चिंगारी भी सुलग जाय तो शोला बनने में देर नहीं लगती, और परिस्थितियाँ अनूकूल हो तो फिर कहना ही क्या|
लगभग सुनसान सी रहने वाली लंबी चौड़ी हवेली में उनकी प्रेम बेल को परवान चढ़ने के अवसर थे|
वह प्रेम सम्बन्ध प्रगाढ़ होता गया|
दोनों एक-दूसरे में खोए रहते| फुलमतिया भी तब भूल गई थी| उसके यौवन का बाँध टूट गया और वह पहाड़ी नदी की तरह उछाल मारता हुआ बहने लगा|
कच्ची उम्र का प्रेम भावनाओं के धरातल पर होता है|
दोनों ने एक-दूसरे का भावनाओं में वरण कर लिया और एक दिन फुलमतिया की प्यारी सखी राजो की उपस्थिति में भगवान को साक्षी बनाकर शादी भी कर ली और हवेली में लगे ठकुराईन के तैल चित्र के सामने फुलमतिया ने हाथ जोड़कर अपने सुहाग के लिए आशीर्वाद की कामना की|
राजो उन दोनों के इस सम्बन्ध की अकेली राजदार थी|
कहना न होगा कि दोनों में पति-पत्नी का सम्बन्ध भी स्थापित हो चुका था| दोनों दुनिया से बेखबर स्वप्न लोक में विचरण कर रहे थे लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रही|
एक दिन जब दोपहर को रोज की तरह फुलमतिया कमरे में पहुँची तो दिग्विजय उसके इन्तजार में बेचैन टहल रहा था|
उसको आया देख बाँहें फैलाकर स्वागत किया और फुलमतिया उसमें समा गई|
दिग्विजय की बाँहों का बंधन कसने लगा था|
फुलमतिया ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया और अपने होठों से उसके चेहरे पर लगातार कई चुम्मन जड़ दिए|
उसी समय ठाकुर साहब की कड़कदार आवाज गूँजी|
काँप गए दोनों…..| जल्दी से अलग हो गए| अपराध का भाव चेहरे पर उभर आया था| आँखें झुक गए…..
फुलमतिया कमरे से बाहर जाने लगी….ठाकुर साहब के पास से गुजरते समय उसके कानों में उनका तीखा क्रोध भरा स्वर सुनाई पड़ा-
कम से कम अपनी औकात तो देख लेती|
रातभर फुलमतिया की आँखों में दिग्विजय का चेहरा नाचता रहा| उसको विश्वास हो गया था कि यह कहानी खत्म हो गई है| अब इन यादों के सहारे ही जीवन काटना पड़ेगा|
ठाकुर साहब के शब्द अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे|
उसे अपनी भूली हुई औकात का फ़िज से अहसास हो गया था….लेकिन एक बात का गर्व उसे अपने आप पर अवश्य था कि वह कुँवर साहब की पत्नी थीचाहे दुनिया की नजरों में न सही|
अगले दिन से फुलमतिया हवेली नहीं आई| ठाकुर साहब के सामने जाने का साहस नहीं था उसमें| दो दिन इसी तरह बीत गएवह बेचैन तो थी, अपने प्रियतम को देख पाने के लिए लेकिन मजबूरी थीदिल पर पत्त्थर रखना पड़ा|
तीसरे दिन जब दिन ढलने के समय जंगल से लकडियों का गठ्ठर लेकर घर पहुँची तो उसे ओपनी झोपड़ी से थोड़ी दूर पर दिग्विजय दिखाई दिया| समझ गई वे जरूर उसे देखने आए है| अपने आप पर गर्व सा हो गया उसेउसका मुरझाया हुआ चेहरा फूल की तरह खिल उठा| झोपड़ी के सामने गठ्ठर पटककर उसने घूमकर अपने प्रियतम को देखादूर से ही आँखें मिली|
दिग्विजय ने आँखों के इशारों से उसे अपने पास बुलाया|
फुलमतिया ने आँखों में ही अपनी विवशता जाहिर कर दी|
दिग्विजय जैसे दीवाना हो गया था| झोपड़ी की ओर बढ़ने लगा|
किसी के द्वारा देख लिए जाने से डर गई वह| खोजी नजरों से इधर-उधर तोह ली| सौभाग्य से दूर-दूर तक कोई नहीं था| उसका बापू भी काम पर गया था| उसने दिग्विजय को मना करना चाहा पर तब तक देर हो चुकी थी| वह उसके पास पहुँच चूका था|
फुलमतिया को कुछ नहीं सूझा तो वह झोपड़ी के पीछे पेड़ों के झुरमुट में चली गई, जहाँ उनके देखे जाने की संभावना काफी कम थी|
दिग्विजय भी उसके पीछे-पीछे पहुँच गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया|
कुँवर साहब आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था| कोई देख लेगा तो आपकी बदनामी हो जाएगी|
दिग्विजय ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं….वह तो पागलों की तरह उसके चेहरे पर जगह-जगह चूमें जा रहा था|
फुलमतिया भी पिघलने लगीलता की तरह लिपट गई|
दोनों एक-दूसरे में समा जाना चाहते थे|
मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह सकता…..
फुलमतिया का मैला हाथ उसके मुँह पर पहुँच गया और दिग्विजय अपनी बात पूरी नहीं क्र सका|
बड़ी-बड़ी आँखों से उसने मना कर दिया| दिग्विजय ने हौले से उसका हाथ अपने हाथ में लेकर चूमते हुए कहा-
मैं क्या करूँतुम्हारे बिना सब सूना-सूना सा लगता है|
फुलमतिया ने दिग्विजय के चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया और उन्माद में उसे चूमने लगी| उसकी आँखों में आंसू बह पड़ना चाहते थे| उन्हें रोकने का प्रयास करते हुए भावुक होकर कहा-
मुझे इतना प्यार मत दो मेरे देवता! मैं पागल हो जाऊँगी|
उसके बाद कुछ देर के लिए वे दुनिया को भूल गए|
तुफ़ान गुजर गया तो फुलमतिया ने बापु के आने की बात बताकर उसे जाने के लिए कहा|
दिग्विजय भी अब हल्का हो चुका था| उसे लगा यहाँ अधिक ठहरना उचित नहीं है|
पहले फुलमतिया पीछे से निकलकर आई| इधर-उधर देखकर उसने दिग्विजय को आने का इशारा किया|
विदा लेते समय दिग्विजय ने उसे एक बार फिर आपनी बाँहों में ले लिया|
फुलमतिया ने प्यार भरी आँखों से उसे देखाउसके होठों को चूमकर बोली- यहाँ फिर मत आनामेरी जैसी छोटी जाति की लड़की के लिए आप बदनाम होंयह ठीक नहीं होगा| फुलमतिया ने यह जिंदगी तुम्हारे नाम कर दी है|
दिग्विजय चला गया तो फुलमतिया अंदर झोपड़ी में चारपाई पर पड़ गई| एक नशा सा चढ़ा हुआ था| सारा शरीर टूट रहा था| आँखें बन्द हुई जा रही थी| बाहर अँधेरा बढ़ने लगा था परन्तु फुलमतिया को कुछ आभास नहीं था|
उसके बापु ने आकर उठाया तो उस पर सर दर्द का बहाना करके पड़ी रही| वह अभी भी अनुभूतियों के सागर में तैर रही थी| इस सुख को वह ज्यादा से ज्यादा देर तक बनाए रखना चाहती थी|
तीन-चार दिन बीत गए| एक दिन जब फुलमतिया मंदिर से बाहर निकली थी तो बाहर दिग्विजय खड़ा था|
एकदम उदास और थका-थका सा….जैसे कई दिनों से सोया न हो|
प्रियतम का यह रूप देखकर उसका हृदय कसक उठा| आँखों में पानी भर आया| पास आई तो भरी आवाज में कहा- यह क्या हालत क्र रखी है आपने
आगे उसका गला रूंध गयाशब्द नहीं निकले| मन हुआ दौड़कर उसके सीने से लग जाय परन्तु अवसर नहीं था| स्वयं पर निय्न्त्रण रखे रही….बस भीगी आँखों से उसे देखती रहीदीवानी सी…..
दिग्विजय ने कहा-
तुम्हारे बिना सब सूना-सूना सा लगता है| कुछ भी मन को नहीं भातातुम्हारी सूरत हर समय आँखों में नाचती रहती है|
फुलमतिया की भी यही हालत थी, क्या उपाय बताती| वह एक तक देखती उसके मुखड़े को मानो कह रही हो…..
मैं…. इतना प्यार….मुझ अभागन सेधन्य हो गई हूँ मैं…….
दिग्विजय आगे कह रहा था-
यहाँ रहकर इस दूरी को बरदाशत करना अब मेरे बीएस में नहीं है| आज शहर लौटकर जा रहा हूँशायद मन कुछ सब्र कर सके|
फुलमतिया चुप रहीकहने को कुछ था भी नहींअपनी व्यथा सुनाकर प्रियतम का दुःख और नहीं बढ़ाना चाहती थी|
चुपचाप जमीन पर बैठकर उसने दिग्विजय के चरण स्पर्श किये और उसकी चरणरज से अपनी माँग भर ली थी|
दिग्विजय ने उसे उठाया और अपने सीने से लगाकर उसके होंठो पर अपने होंठो से प्यार की मुहर लगा दी|
दिग्विजय शहर चला गया| फुलमतिया बीती यादों के सहारे दिन पूरे करने लगी| उसके बाद दिग्विजय की कोई खबर नहीं मिली उसे| कोई साधन भी नहीं था लेकिन विरह की अग्नि में तपकर फुलमतिया का प्यार कुंदन बन रहा था|
दिग्विजय का एक फोटो उसने राम चरित मानस में रख छोड़ा था और सुबह-शाम देवता की तरह उसकी पूजा करती| कोई दूसरा उसके इस आचरण को पागलपन की संज्ञा देगा परन्तु फुलमतिया तो किसी और पर जी रही थी|
सुबह-शाम मंदिर ज्योति जलाने जाती तो भगवान से अपने प्रियतम के कल्याण और सुख के लिए प्रार्थना करती|
महीना भर बीत गयाफुलमतिया जान गई कि उन दोनों प्यार की निशानी उसकी कोख में पनप रही है| दुनिया से उसे छिपाए ही रहीसिवाय राजो के………|
फुलमतिया की बात सुनकर राजो चिंतित हो गई| उसने गर्भ समाप्त करवा देने को कहा| फुलमतिया तय्यार नहीं हुईउसका मातृत्त्व जागृत हो चुका था और फिर कैसे वह अपने हाथों से अपने प्यार के फल का बध करती|
समय पर उसने सारे विरोध सहकर भी अपने बेटे को जन्म दिया| उसका बाप इसको छुपाए रखने का प्रयत्न करता हुआ कोई उपाय सोच रहा था लेकिन यह छुपने वाली बात न थी और न छुपी रह सकी| यह खबर जंगल में लगी आग की तरह देखते ही देखते सारे गाँव में फ़ैल गई| सारा गाँव उस पर थू-थू करने लगा|
उसका बाप भी उससे नहीं बोलता था| एकदम अकेली थी फुलमतियाहाँअगर कोई साथ था तो उसकी प्रिय सखी राजो…….| वही अकेली थी जो धीरज बँधाती थी, वरना फुलमतिया अकेली अपने दुःख को कम करने के लिए अपने बेटे को निहारती रहती या उससे उसके पिता की बातें करती|
गाँव के लोगों ने फुलमतिया के मामले में पंचायत करने का फैसला लिया|
उसका बाप चिंतित हो गया| राजो भी परेशान हो गई पर फुलमतिया एकदम शांत थी जैसे उसे कोई चिंता नहीं थी| प्रेम की पवित्र भावना के जिस धरातल पर निवास करती थी वहाँ किसी भय के लिए कोई स्थान था भी नहीं|
फुलमतिया को अपना अंजाम मालुम थाउसे गाँव छोड़ना पड़ेगा| वह पूरी तरह तैयार थीहर स्थित का सामना करने के लिए| उसके एक मन ने कहा- एक दिन चुप-चाप गाँव छोड़कर अपने बेटे के साथ कहीं चली जायपर जा न सकी| चोरी से मुँह छुपाकर भागकर वह अपने प्रेम को कलंकित नहीं करना चाहती थी| उसकी एक ही अभिलाषा थीएक बार अपने देवता को अपना बेटा दिखा देने की और उनके चरण छूकर विदा लेने की|
पंचायत से एकदिन पहले जब गाँव के लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में व्यस्थ थे| प्रधान फुलमतिया के बहाने ठाकुर साहब से दुश्मनी निकालने की तैयारी में लगा है| लोगों को ठाकुर साहब के खिलाफ भड़काकर जनमत तैयार कर रहा है|
फुलमतिया अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर बैठी हुई हाथ में एक नुकीला पत्थर लिए रेतीली जमीन पर लकीरें खीच रही थी| ख्यालों खोई हुई सोच रही थीक्यूँ नहीं आएकौन सी मजबूरी हो गई हैभूल तो नहीं गएउनके दर्शन की साध पूरी होगी या नही…..?
फुलमतिया विचारों में इतनी खो गई कि उसे अपने जिगर के टुकड़े के रोने की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ रही है|
राजो ने उसकी विचार श्रृंखला को भंग किया तथा अंदर झोपड़ी में बच्चे के रोने की सूचना दी| फुलमतिया ने खोई-खोई आँखों से राजो को देखा….
आँखों में एक ही प्रश्न थामेरी चिट्ठी उन तक पहुँचवा दी या नहीं….?
राजो ने उसके भार को पढ़ लिया तथा तसल्ली देते हुए उसे चिट्ठी पहुँचवा देने की बात कही|
फुलमतिया ने गहरी साँस छोड़कर मिट्टी की दीवारों से पीठ लगाकर आसमान में देखा|
राजो अंदर से बच्चे को लेकर आ गई| वह चुप होकर माँ को देखने लगाजैसे उसकी व्यथा का अहसास हो गया हो| थोड़ी देर के मौन के बाद राजो ने कहा-
तू पंचायत के सामने कह क्यों नहीं देती, उसका बाप ठाकुर का लड़का है| तूने शादी की है उससे मंदिर में…. गवाही दूँगी तेरी|
फुलमतिया ने सखी की ओर देखाबोली- उनकी बदनामी नहीं होगी क्याहवेली की इज्जत मिट्टी नहीं मिल जाएगी| हवेली की शान का क्या होगा फिरमेरे ऊपर दुःख पड़ा है तो उससे बचने के लिए इतना सब दाँव पर लगा दूँइतना गिर जाँऊ क्या…| जिसे मन से देवता मान लिया है उसी के विनाश का कारण बनूँ…..? सब कुछ तो उन चरणों में अर्पित कर चुकी हूँअब क्या है मेरे पास जिसे बचाने के लिए यह पाप करूँ….|
पर फलराजो ने उसे समझाने का प्रयास किया|
फुलमतिया ने उसे रोकते हुए कहा- तू मुझसे बहुत प्यार करती हैइतना तो कोई माँभाई भी न करतीइसी से मेरा दुःख नहीं देख सकती| पर बहनमुझे तो परीक्षा देनी है| धर्म से गिर गई तो इस जालिम दुनिया का सामना नहीं कर पाऊँगीतू देख लेना मेरा प्यार हार नहीं सकतामैं जीतकर दिखाऊँगीअपने आपको उनके लिए न्योछावर कर दूँगी…..|
राजो खामोश हो गई और क्या करती…. बस फुलमतिया के चेहरे को देखती रहीउसकी आँखों में आँसू आ गए|
मन में सोच रही थी- ऐसे पवित्र विचार लेकर कहाँ पैदा हो गई तूयहाँ कौन कदर करेगा तेरी….?
रात का आखरी पहर था| राजो जा चुकी थी| फुलमतिया अपने बेटे को दूध पीला रही है| उसके हाथ में दिग्विजय का फोटा था, जिसे निहार रही थी वह|
फोटा रखकर उसने गोद में सोए हुए बेटे को देखाफिर उसे चूम लिया| चारपाई पर लिटाकर उसे कपड़ा ओढ़ा रही थी कि मुर्गे ने बाग देकर रात बीत जाने की सूचना दी| वह खड़ी हुई और बेटे को एक बार चूमकर झोपड़ी से बाहर निकली|
रात की शांति के बाद सूर्य की किरण फूटने के साथ ही गाँव में लोगों की हलचल शरू ही गई|
उस समय फुलमतिया मंदिर में भगवान की मूर्ति के सामने प्रार्थना कर रही थी|
तुम तो जानते हो मैंने कोई पाप नहीं कियाआज अग्नि परीक्षा मेरे प्रेम और विश्वास की लाज रखनी पड़ेगी…. तुझे कसम है अपने राधा की……|
प्रार्थना के बाद जब फुलमतिया मंदिर के बाहर आई तो उसका मुख-मंडल दमक रहा था| पंडित जी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ना चाहते ही थे कि उसे देखकर रुक गए| उसके पास पहुँचकर फुलमतिया ने उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया|
फुलमतिया ने खड़े होकर पंडित जी की ओर देखा…| पंडित जी की अनुभवी आँखें उसकी व्यथा को जान गईं|
धैर्य रखोआज अग्नि परीक्षा है तुम्हारी………
फुलमतिया ने प्रश्न किया- आप तो धर्म को जानते है, क्या मैंने पाप किया है?
पंडित जी उसका आशय जान गए थे….मुस्कराए- प्रेम तो जीव की सबसे पवित्र भावना है, पाप कैसे हो सकती है| पवित्र भावना से किया गया कोई भी कार्य धर्म के विरोध में नहीं हो सकता| यदि तमने मन की पवित्रता से प्रेम किया है तो तुम्हारी हार की कोई संभावना नहीं| समाज या पंचायत तो भीड़ की संस्थाएं है….वहाँ निर्णय बहुमत की सुविधाओं को ध्यान में रखकर होता हैधर्म का विचार नहीं होता वहाँ……|
यह तो समय निश्चित करेगा कि तुम रुक्मणी के आसन पर विराजमान होती हो या राधा के…..पर हर स्थित में जीत तुम्हारी ही होगी|
गाँव में पंचायत की तय्यारी हो चुकी थी| लोग जुड़ना शुरू हो गए थेअलग-अलग भावनाएं लिए……|
कोई फुलमतिया का अंजाम जानना चाहता था तो कोई ठाकुर साहब की इज्जत काकिसी को सिर्फ तमाशे से मतलब था| कुछ कोमल हृदय ऐसे भी थे जिन्हें फुलमतिया के साथ हमदर्दी थी और दिग्विजय को गाली दे रहे थे|
फुलमतिया झोपड़ी में प्रियतम का फोटो सामने रखे आखिरी बात कह रही थी| उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, जिन्हें वह हमेशा रोके रहने की आज तक कोशिश करती रही| आज उसका धर्य जवाब दे चुका था|
तुम नहीं आएतुम्हारी मजबूरी को जानती हूँ मैंबस एक साध थी, एक बार तुम्हारी चरण-रज से अपनी माँग भर पाती……पर शायद मेरा भाग्य ही कमजोर हैमेरे विश्वास में कोई कमी रह गई है|
मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँजो थोड़े से फूल तुमने मुझ अभागन की झोली में दाल दिए है उसी से मेरा जीवन सार्थक हो गया है| इस खुश्बू से मेरा मन हमेशा महकता रहेगा उन मीठी-मीठी यादों के सहारे, मैं अपना जीवन काट दूँगी फिर तुम्हारे प्यार की निशानी तो मेरे पास है ही…..तुमने तो देखा नहीं उसेतुम्ही पर गया है| उसकी आँखें बिलकुल तुम्हारी जैसी हैतुम्हारी ही तरह प्यार से देखता है मुझे|
आज पंचायत हैगाँव वाले हमारे बेटे के पिता का नाम जानना चाहते हैं, पर तुम चिंता मत करनामेरे जीते जी तुम्हारी इज्जत पर आँच नहीं आ सकती| शायद आज आखिरी दिन हो मेरा गाँव में….| पता नहीं कहाँ जाऊँगीअपनी फूल के लिए दुखी मत होना| आशीर्वाद दो मुझे…..|
पंचायत में जब फुलमतिया पहुँची तो उसके चेहरे से तेज टपक रहा था| एकदम शांतकोई हर्ष और विषाद नहीं| फुलमतिया को देखकर सारी भीड़ एकदम शांत हो गई| सभी उसे आश्चर्य से देख रहे थे|
पंचायत की औपचारिक्ता शुरू हुई| उसका अपराध बताया गया|
वह चुपचाप सुनती रही बिना किसी प्रतिक्रिया के…….|
प्रधान ने बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए कहा|
फुलमतिया ने बिना कोई शब्द बोले प्रधान की तरफ देखा फिर चारो ओर खड़ी हुई भीड़ को|
सभी साँस रोके उसके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे|
प्रधान ने किसना की शिकायत की चर्चा की और दिग्विजय का नाम लेकर फुलमतिया से जानना चाहा कि क्या यह सही है कि वही उसके बच्चे का बाप है|
फुलमतिया ने एकबार फिर भीड़ की ओर देखाजग्गू ठाकुर साहब का पुराना लठैत, उसे देख रहा था| फुलमतिया के चेहरे पर दृढ़ता का भाव पैदा हो गया और भीड़ ने आश्चर्य से सुना- नहींउनका मुझसे या इस बच्चे से कोई सम्बन्ध नहीं……|
दूसरी औपचारिकताएं भी पूरी हो गई| प्रधान नेजिसके सारे मंसूबों पर पानी फिर गया थाफुलमतिया के प्रति कठोर रुख अपनाया| उसे मुँह काला करके सारे गाँव में घुमाए जाने तथा गाँव से बाहर निकाल देने की सजा सुनाई गई|
सजा सुन फुलमतिया के चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ गई|
उसे खुशी थी कि वह अपने देवता के सम्मान की रक्षा कर सकी|
सब लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे| बस अकेली राजो अपनी भीगी आँखों को मैले आँचल से पोछ रही थी|
गाँव के बीचो-बीच एक पीपल के बड़े वृक्ष के नीचे सारा गाँव जमा था|
फुलमतिया को सजा दिए जाने की तैयारी हो रही थी|
प्रधान पहुँच गए थे|
उनके आदेश पर एक आदमी तवे की स्याही हाथों में लगाकर आगे बढ़ा| वह अपने हाथ फुलमतिया के चेहरे पर लाना ही चाहता था कि सब काँप उठे….
चौंक कर देखे तो ठाकुर साहब जग्गू के साथ, हाथ में बन्दूक लिए खड़े थे जिसकी नाल से अभी भी धुआँ निकल रहा था| उनके चेहरे पर दृढ़ता का भाव था| वे मजमें के बीच फुलमतिया के सामने आ गए|
सब शांत खड़े थे, सिर्फ ठाकुर साहब की आवाज गूँज रही थी- फुलमतिया हवेली की इज्जत हैयाद रखना, हम इतने कमजोर नहीं हुए हैं कि अपनी आबरू की हिफाजत न कर सकें|
उसके बाद वे घूमेंप्यार से फुलमतिया के सिर पर हाथ रखते हुए कहा- अपने घर चलो बहू….|
फुलमतिया के आँसुओं का बाँध टूट पड़ा|
उसने कृतज्ञता के भाव से ठाकुर साहब की ओर देखा और उनके चरणों में झुक गई|
इति शुभम……….

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