Sunday, 18 August 2013

वो देखो मनचली है....



जंगल में हवा चली है|
वो देखो मनचली है|


गाने लगा भ्रमर दल,
तू किस तरह कली है|

संध्या की स्वप्न माला,
क्यों आग में जली है|

अव्याहत अनुवाद देख,
याद में ढली है|

अब ताजगी मिलेगी, 
क्या देह संदली है|

अंदाज नया लगता,
तू धुप में जली है|

मैं तो तेरी ही जद में,
छाया स्वयं छली है|
रचनाकार :-राजीव मतवाला

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